नई दिल्ली। Vote Chori: संसद के शीतकालीन सत्र में बुधवार को चुनाव सुधारों पर चली गरमागरम बहस के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के ‘वोट चोरी’ के आरोपों का करारा जवाब दिया। शाह ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर कांग्रेस द्वारा फैलाए जा रहे “झूठ” को बेनकाब करते हुए कहा कि चुनाव आयोग पूरी तरह स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और सरकार उसमें दखल नहीं दे सकती।
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उन्होंने याद दिलाया कि 2000 के बाद तीन बार SIR हो चुका है – दो बार NDA और एक बार मनमोहन सरकार में – तब कांग्रेस ने कभी विरोध नहीं किया।अमित शाह ने राहुल गांधी के हरियाणा वाले “एक घर में सैकड़ों वोटर” वाले दावे को भी खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग ने मौके पर जाकर सत्यापन किया, दावा पूरी तरह झूठा निकला।
यह फर्जी नैरेटिव बनाने की कोशिश है।”सबसे तीखा हमला करते हुए शाह ने कांग्रेस के इतिहास की तीन बड़ी “वोट चोरी” की घटनाएं गिनाईं। 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष (जो आगे चलकर देश का पहला प्रधानमंत्री बनना था) के लिए हुए आंतरिक चुनाव में सरदार पटेल को प्रांतीय समितियों से भारी बहुमत मिला था, लेकिन गांधीजी के हस्तक्षेप के बाद नेहरू को प्रधानमंत्री बना दिया गया। शाह ने इसे पहली “वोट चोरी” बताया।
1971 के रायबरेली लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चुनावी अनियमितताओं के कारण अयोग्य घोषित कर दिया था। शाह ने कहा – “यह साफ-साफ वोट चोरी थी। फिर इमरजेंसी लगाकर 39वां संविधान संशोधन लाकर खुद को प्रधानमंत्री पद पर कानूनी इम्युनिटी दे दी गई।” तीसरी घटना के रूप में शाह ने इंदिरा गांधी द्वारा सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठ जजों को सुपरसीड करके अपने पसंद के जज को चीफ जस्टिस बनाने और सोनिया गांधी के भारतीय नागरिकता मिलने से पहले ही मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के मौजूदा अदालती मामले का जिक्र किया।
शाह ने तंज कसते हुए कहा, “आज कांग्रेस चुनाव आयोग को इम्युनिटी देने का आरोप लगा रही है, लेकिन इंदिरा जी ने तो खुद प्रधानमंत्री पद को ही कोर्ट के दायरे से बाहर कर दिया था।”उन्होंने अंत में चेतावनी दी – “घुसपैठिए यह तय नहीं करेंगे कि देश का प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री कौन बनेगा। मतदाता सूची को शुद्ध करना लोकतंत्र को पवित्र रखने की प्रक्रिया है।
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