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UP Politics: यूपी में रामदास आठवले की एंट्री, बढ़ाएंगे मायावती और अखिलेश की मुश्किलें

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लखनऊ, 23 दिसंबर 2025। UP Politics: केंद्र सरकार में एनडीए की सहयोगी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई-आठवले) उत्तर प्रदेश में सक्रिय रूप से विस्तार कर रही है, जिससे बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) के लिए राजनीतिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं। पार्टी अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने हालिया बयानों में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को न्याय दिलाने का वादा किया है।

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उन्होंने डीपीए (दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक) की अवधारणा को आगे बढ़ाने का दावा किया, जो सपा के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की सीधी काट मानी जा रही है। आठवले ने दावा किया कि यूपी के 75 जिलों में से 62 में पार्टी की कार्यकारिणी गठित हो चुकी है। पार्टी अगले साल 5 अप्रैल 2026 को लखनऊ में बड़ी रैली आयोजित करेगी, जिसमें एक लाख से अधिक लोगों की भीड़ जुटने का अनुमान है।

उन्होंने कहा कि अब बसपा की जगह आरपीआई ने ले ली है और दलितों, शोषितों तथा गरीबों को न्याय दिलाने वाली असली पार्टी उनकी ही है। आठवले ने बसपा सुप्रीमो मायावती पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि लंबे सत्ता काल के बावजूद दलितों, वंचितों, महिलाओं और गरीबों के लिए शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव के पीडीए नारे पर भी आठवले ने निशाना साधा। उन्होंने इसे मात्र चुनावी जुमला करार दिया, जो कभी जमीन पर उतरा ही नहीं। इसके जवाब में आरपीआई डीपीए की अवधारणा को मजबूती से लागू करेगी और वास्तविक बदलाव लाएगी। सोमवार को उत्तर प्रदेश कार्यकारी समिति की समीक्षा बैठक में आठवले ने प्रदेश की राजनीतिक स्थिति, दलित-शोषित समुदायों की समस्याओं और संगठन विस्तार पर विस्तृत चर्चा की।

बैठक में जोर दिया गया कि पार्टी नारे नहीं, बल्कि जमीन पर प्रभावी काम कर रही है। एनडीए का हिस्सा होने के नाते आरपीआई की यह सक्रियता यूपी में दलित वोट बैंक को प्रभावित कर सकती है, जो बसपा का कोर वोटर रहा है। साथ ही, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग में सपा के पीडीए की लोकप्रियता को चुनौती मिल सकती है।

आठवले की रणनीति दलित राजनीति को एनडीए के साथ जोड़ने की है, जिससे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी समीकरण बदल सकते हैं। यह कदम उत्तर प्रदेश की जातीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर रहा है, जहां विपक्षी दल पहले से ही एकजुटता की कोशिश कर रहे हैं। आरपीआई का विस्तार दलितों और वंचितों के बीच विकल्प की तलाश को बल दे सकता है।

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