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UP Panchayat Chunav: यूपी पंचायत चुनाव पर संकट, ओबीसी आरक्षण आयोग न बनने से 2026 की टल सकती है वोटिंग!

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UP Panchayat Chunav

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लखनऊ, 3 अक्टूबर 2025। UP Panchayat Chunav: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 2026 में प्रस्तावित त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव पर अब बादल मंडरा रहे हैं। पिछड़ा वर्ग के आरक्षण संबंधी संस्तुतियों के लिए समर्पित आयोग का गठन न होने से निर्धारित समयसीमा पर चुनाव कराना मुश्किल होता नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयोग अपनी रिपोर्ट देने में छह माह का समय लेता है, तो अप्रैल-मई 2026 में होने वाले चुनावों में भारी देरी हो सकती है। यह स्थिति न केवल ग्रामीण लोकतंत्र को प्रभावित करेगी, बल्कि राजनीतिक दलों के बीच भी तनाव पैदा कर सकती है।

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उत्तर प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले त्रिस्तरीय चुनाव—ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत—के लिए समयसीमा करीब आ रही है। 26 मई को ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो जाएगा, जबकि 11 जुलाई को क्षेत्र पंचायतों और 19 जुलाई को जिला पंचायतों का। इनका नया कार्यकाल शुरू करने के लिए अगले साल अप्रैल-मई में मतदान होना तय है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले ने इस प्रक्रिया को जटिल बना दिया है।

कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण लागू करने से पहले उनकी आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक स्थिति का वैज्ञानिक सर्वेक्षण अनिवार्य है। बिना इस अध्ययन के आरक्षण की व्यवस्था वैध नहीं मानी जाएगी। नगर निकाय चुनावों की तर्ज पर पंचायत चुनावों में भी ओबीसी आरक्षण का फॉर्मूला तय करना होगा। इसके लिए राज्य सरकार को जल्द अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करना पड़ सकता है। यह आयोग प्रदेश भर में ओबीसी समुदाय की वास्तविक स्थिति का आकलन करेगा और रिपोर्ट सौंपेगा, जिसमें आरक्षण की आवश्यकता व प्रतिशत की सिफारिशें शामिल होंगी।

यदि आयोग का गठन विलंब से होता है या रिपोर्ट तैयार होने में देरी हुई, तो चुनाव आयोग को नई तारीखें घोषित करनी पड़ेंगी। पंचायत चुनावों में केवल छह माह का समय बाकी है, जो इस देरी को और गंभीर बना रहा है।दूसरी ओर, ग्रामीण स्तर पर चुनावी हलचल शुरू हो चुकी है। ग्राम पंचायतों में प्रधान पद के दावेदार गांव-गांव में सक्रिय हो गए हैं। वे वोटरों को लुभाने के लिए विकास कार्यों का बखान कर रहे हैं, सभाओं का आयोजन कर रहे हैं और सामाजिक समर्थन जुटा रहे हैं। कई जगहों पर गुटबाजी भी उभर रही है, जहां पुराने प्रधान उम्मीदवारों के खिलाफ नई चेहरों का उभार हो रहा है। लेकिन आरक्षण का मुद्दा अनसुलझा रहने से ये प्रयास व्यर्थ जा सकते हैं।

राजनीतिक दल भी चिंतित हैं, क्योंकि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माने जाते हैं। सपा, भाजपा और बसपा जैसे दल अपनी रणनीति इसी आधार पर बनाते हैं।सरकार ने अभी तक आयोग गठन पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन विभागीय स्तर पर चर्चाएं तेज हैं। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह देरी ग्रामीण विकास को प्रभावित करेगी। पंचायती राज मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि सर्वेक्षण के लिए त्वरित प्रक्रिया अपनाई जा रही है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन अनिवार्य है। कुल मिलाकर, ओबीसी आरक्षण का यह ‘रोड़ा’ यूपी के ग्रामीण लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बन रहा है। क्या सरकार समय पर फैसला लेगी? आने वाले दिनों में स्थिति स्पष्ट होगी।

 

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