नई दिल्ली, 30 दिसंबर 2025। Silver Price Record High: 2025 का साल चांदी के लिए ऐतिहासिक रहा। साल की शुरुआत में जहां चांदी की कीमत करीब 29-30 डॉलर प्रति औंस थी, वहीं दिसंबर के अंत तक यह 79 डॉलर तक पहुंच गई – यानी 150-170% से ज्यादा की तेजी। भारत में एमसीएक्स पर चांदी फ्यूचर्स 2.5 लाख रुपये प्रति किलोग्राम को पार कर गई, जो मिडिल क्लास के लिए बड़ा झटका है।
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पहले चांदी को शादी-ब्याह, पूजा या सस्ता निवेश माना जाता था, लेकिन अब यह “सस्ती धातु” नहीं रही। सवाल यह है कि आखिर चांदी आभूषण से जियोपॉलिटिक्स का हथियार कैसे बन गई? इसकी मुख्य वजहों में से एक है चांदी की बढ़ती इंडस्ट्रियल डिमांड। चांदी की बेहतरीन इलेक्ट्रिकल और थर्मल कंडक्टिविटी इसे ग्रीन एनर्जी और हाई-टेक का अहम हिस्सा बनाती है।
एक सोलर पैनल में औसतन 15-20 ग्राम चांदी लगती है। सोलर एनर्जी की बूम के साथ डिमांड तेजी से बढ़ रही है। इसी तरह इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) में 25-50 ग्राम चांदी इस्तेमाल होती है – बैटरी कनेक्शंस, चार्जिंग इंफ्रा और इलेक्ट्रॉनिक्स में।
एआई चिप्स, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर्स और डिफेंस टेक्नोलॉजी में भी चांदी की जरूरत बढ़ रही है। ग्लोबल डिमांड 2025 में 1.24 अरब औंस पहुंच गई, जबकि सप्लाई सिर्फ 1.01 अरब औंस – यानी 200-230 मिलियन औंस का डेफिसिट। पिछले 5 साल से लगातार डेफिसिट चल रहा है, इन्वेंट्री रिकॉर्ड लो पर हैं, लेकिन असली ट्रिगर बना चीन का फैसला।
चीन दुनिया का सबसे बड़ा चांदी रिफाइनर और उपभोक्ता है, जो ग्लोबल रिफाइंड सप्लाई का 60-70% कंट्रोल करता है। 1 जनवरी 2026 से चीन ने चांदी एक्सपोर्ट पर लाइसेंस सिस्टम लागू किया – सिर्फ बड़ी कंपनियां ही एक्सपोर्ट कर सकेंगी। यह रेयर अर्थ मेटल्स जैसी स्ट्रैटेजी है, जहां चीन घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देकर ग्लोबल सप्लाई चेन पर दबाव बनाता है।
इस घोषणा से दिसंबर में कीमतें रॉकेट की तरह उछलीं। टेस्ला के सीईओ एलन मस्क ने भी चेतावनी दी कि “यह अच्छा नहीं है, क्योंकि चांदी कई इंडस्ट्रियल प्रोसेस में जरूरी है” जियोपॉलिटिकल टेंशन, सेफ हेवन डिमांड और निवेशकों की होर्डिंग ने आग में घी डाला। चांदी अब सिर्फ ज्वेलरी नहीं, बल्कि स्ट्रैटेजिक मेटल बन चुकी है – ग्रीन ट्रांजिशन और टेक वॉर का हथियार।
क्या चांदी नया सोना बन जाएगी? फिलहाल सप्लाई क्राइसिस और डिमांड बूम से कीमतें ऊपर ही रहने की उम्मीद है। आम आदमी के लिए सस्ती चांदी दूर की कौड़ी लग रही है, जबकि बड़े देश और निवेशक इसका फायदा उठा रहे हैं। 2026 में और उछाल आ सकता है, लेकिन वोलेटिलिटी भी बढ़ेगी।
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