नई दिल्ली 10 नवंबर 2025। Misuse of AI: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते दुरुपयोग ने अब न्यायपालिका को भी चिंता में डाल दिया है। भारत के चीफ जस्टिस (CJI) भूषण रामकृष्ण गवई ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि जजों को भी AI जनरेटेड फेक कंटेंट का सामना करना पड़ रहा है। एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान CJI गवई ने कहा, “हां, हमने अपनी मॉर्फ्ड तस्वीरें भी देखी हैं।” यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जो AI की खतरनाक संभावनाओं को उजागर करता है।
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यह मामला रावल बनाम भारत संघ (W.P.(C) No. 001041 / 2025) से जुड़ा है, जिसमें जनरेटिव AI (GenAI) के न्यायिक और अर्ध-न्यायिक निकायों में उपयोग को नियंत्रित करने के लिए कानूनी या नीतिगत ढांचे बनाने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया कि AI के न्यूरल नेटवर्क्स ‘हैलुसिनेशन’ पैदा कर सकते हैं, जिससे फर्जी केस लॉ, पक्षपाती फैसले और मनमानी व्याख्या हो सकती है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, क्योंकि यह समानता के सिद्धांत को प्रभावित करता है। याचिकाकर्ता ने चेतावनी दी कि AI डेटा की अस्पष्टता से न्यायिक डेटा, जो जजों का होना चाहिए, खतरे में पड़ सकता है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, “यह कोर्ट भी AI का उपयोग कर रहा है, लेकिन इसके खतरे…” तभी CJI गवई ने बीच में टोकते हुए कहा, “हमें पता है, हमने अपनी (दोनों जजों की) मॉर्फ्ड वीडियो देखी है।” यह संदर्भ सोशल मीडिया पर घूम रही एक फर्जी वीडियो का था, जिसमें CJI गवई के कोर्टरूम में जूते फेंकने की घटना को AI से मॉर्फ किया गया था। यह वीडियो गलत सूचना फैलाने के लिए बनाई गई थी, जो न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाती है। बेंच में CJI गवई के साथ जस्टिस के. विनोद चंद्रन भी थे।
CJI गवई ने स्पष्ट किया कि AI जैसी तकनीकों को नियंत्रित करने का कदम कार्यपालिका (एक्जीक्यूटिव) को उठाना चाहिए, न कि अदालत को। उन्होंने याचिकाकर्ता से पूछा, “क्या इसे अभी खारिज कर दें या दो हफ्ते बाद देखें?” मामला दो हफ्ते के लिए स्थगित कर दिया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह टिप्पणी AI के न्यायिक उपयोग पर बहस को तेज करेगी। जस्टिस गवई, जो मई 2025 से CJI बने हैं, पहले भी AI को मानव बुद्धि का विकल्प न मानने की बात कह चुके हैं। उन्होंने कहा था कि AI भविष्यवाणी करने के लिए इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन भावनाओं और नैतिकता के बिना यह कानूनी जटिलताओं को नहीं समझ सकता।
भारत में AI का दुरुपयोग तेजी से बढ़ रहा है। वकील और शोधकर्ता AI से फर्जी केस साइट करते हैं, जिससे पेशेवर शर्मिंदगी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने लाइव स्ट्रीमिंग पर दिशानिर्देश बनाने की जरूरत बताई है, ताकि पारदर्शिता और जिम्मेदारी बनी रहे। सरकार को जल्द नीति बनानी चाहिए, वरना डीपफेक और मिसइनफॉर्मेशन लोकतंत्र को कमजोर करेंगे। यह घटना दर्शाती है कि तकनीक का दोहरा चेहरा न्यायपालिका को भी चुनौती दे रहा है। CJI गवई की यह बेबाकी AI रेगुलेशन के लिए नया मोड़ ला सकती है।
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