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मायावती का DM फॉर्मूला, सत्ता की वापसी के लिए मुस्लिम-दलित गठजोड़, क्या बनेगा भरोसा?

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Mayawati

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लखनऊ, 30 अक्टूबर 2025। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती एक बार फिर सक्रिय मोड में आ गई हैं। 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले उन्होंने ‘DM फॉर्मूला’ को हवा दी है, जो दलित-मुस्लिम (Dalit-Muslim) गठजोड़ पर आधारित है। यह फॉर्मूला बसपा को सत्ता की कुर्सी पर वापस लाने का दावा करता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या मुस्लिम समुदाय का बसपा पर खोया हुआ भरोसा फिर से बन पाएगा?

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हालिया घटनाक्रमों से लगता है कि मायावती इस दिशा में ठोस कदम उठा रही हैं। 29 अक्टूबर 2025 को लखनऊ में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में मायावती ने मुस्लिम समाज भाईचारा संगठन के साथ रणनीति तय की। उन्होंने सभी 18 मंडलों में दो-दो सदस्यों वाली मुस्लिम भाईचारा समितियों के गठन का ऐलान किया। तीन महीनों के अंदर सभी स्तरों पर इन समितियों को मजबूत बनाने का लक्ष्य है। मायावती ने स्पष्ट कहा कि अगर मुस्लिम समाज भाजपा को हराना चाहता है, तो समाजवादी पार्टी (सपा) या कांग्रेस के बजाय बसपा ही सच्चा विकल्प है। उन्होंने सपा-कांग्रेस पर आरोप लगाया कि ये दल भाजपा को सत्ता से हटाने में बार-बार नाकाम रहे हैं।

इस फॉर्मूले का आधार बसपा का पुराना सोशल इंजीनियरिंग मॉडल है, जिसने 2007 में मायावती को मुख्यमंत्री बनाने में सफलता दिलाई थी। तब दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण गठजोड़ ने चमत्कार किया था, लेकिन 2017 और 2022 के चुनावों में बसपा का ग्राफ गिरा, खासकर मुस्लिम वोटरों का पलायन हुआ। अब मायावती मुस्लिमों को लुभाने के लिए कई वादे कर रही हैं। उन्होंने घोषणा की कि बसपा की सरकार बनी तो योगी आदित्यनाथ सरकार के ‘बुलडोजर एक्शन’ को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। साथ ही, मुसलमानों पर दर्ज झूठे मुकदमों को वापस लिया जाएगा।

यह वादा सीधे मुस्लिम समुदाय की चिंताओं को संबोधित करता है, जो भाजपा सरकार के कथित उत्पीड़न से परेशान हैं। मायावती की यह रणनीति विपक्षी दलों के लिए चुनौती है। सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव की PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला पहले से मुस्लिम वोटों पर केंद्रित है, जबकि कांग्रेस भी अल्पसंख्यक कार्ड खेल रही है, लेकिन बसपा का DM फॉर्मूला दलित वोटबैंक को मजबूत रखते हुए मुस्लिमों को जोड़ने का प्रयास है।

पार्टी ने मुस्लिम भाईचारा समितियों के माध्यम से जमीनी स्तर पर संपर्क अभियान तेज कर दिया है। मायावती खुद इन समितियों की रणनीति पेश करेंगी, जो 2027 चुनावों में सोशल इंजीनियरिंग को फिर से जिंदा करने का प्रयास है। हालांकि, चुनौतियां कम नहीं हैं। मुस्लिम वोटरों का एक बड़ा हिस्सा सपा की ओर झुका हुआ है, क्योंकि अखिलेश यादव ने मुस्लिम नेताओं को प्रमुख भूमिकाएं दी हैं। बसपा पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोप भी लगते रहे हैं।

जानकारों का मानना है कि DM फॉर्मूले की सफलता मायावती की व्यक्तिगत अपील और जमीनी कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी। अगर मुस्लिम समुदाय को लगता है कि बसपा ही भाजपा का सबसे मजबूत विकल्प है, तो यह फॉर्मूला गेम-चेंजर साबित हो सकता है। अन्यथा, यह बसपा की सत्ता वापसी की एक और कोशिश मात्र रह जाएगी। कुल मिलाकर, मायावती का यह कदम उत्तर प्रदेश की राजनीति को ध्रुवीकरण की ओर ले जा सकता है। 2027 चुनावों में DM गठजोड़ की परीक्षा होगी, और परिणाम बताएंगे कि क्या बसपा फिर से सत्ता की दहलीज पर पहुंच पाएगी।

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