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एक्स-रे टेक्नीशियन भर्ती में फर्जीवाड़ा, CM योगी की फटकार के बाद भी पुलिस जांच में बाधा डाल रहा महानिदेशालय

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Fraud discovered in X-ray technician recruitment

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लखनऊ, 19 सितंबर 2025। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में एक्स-रे टेक्नीशियन की भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है, जो राज्य की नौकरशाही की गहरी खामियों को उजागर कर रहा है। 2016 में उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) द्वारा जारी 403 उम्मीदवारों की चयन सूची के आधार पर हुई नियुक्तियों में कई फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया।

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सबसे चौंकाने वाला खुलासा आगरा के अर्पित सिंह नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिसके नाम पर एक ही समय में छह जिलों बलरामपुर, फर्रुखाबाद, रामपुर, बांदा, अमरोहा और शामली में नौकरियां हासिल की गईं। इस धोखाधड़ी से राज्य को करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ, क्योंकि फर्जी कर्मचारी 2016 से लगातार वेतन और अन्य लाभ उठाते रहे।

यह घोटाला अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी सरकार के दौर में पनपा, लेकिन वर्तमान योगी आदित्यनाथ सरकार में इसका पर्दाफाश मानव संपदा पोर्टल पर डिजिटल रजिस्ट्रेशन के दौरान हुआ। मुख्यमंत्री योगी ने इस मामले को गंभीरता से लिया और सख्त निर्देश जारी किए। उन्होंने कहा, “पिछली सरकारों में ऐसी भर्तियां होती थीं कि एक व्यक्ति आठ-आठ जगहों पर नौकरी कर वेतन ले लेता था। हम किसी दोषी को बख्शेंगे नहीं।” सीएम के निर्देश पर लखनऊ पुलिस ने वजीरगंज थाने में FIR दर्ज की, और मामला CBI को सौंप दिया गया है।

योगी सरकार ने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम का हिस्सा बनाया, जिसमें पहले से कई भर्ती घोटालों की जांच चल रही है। हालांकि, फर्जीवाड़े की गहराई तब सामने आई जब 2008 की पुरानी भर्ती का भी जिक्र आया। उस समय 79 पदों पर भर्ती में भी इसी तरह का खेल हुआ था, लेकिन जांच रिपोर्ट वाली फाइलें रहस्यमय ढंग से जल चुकी हैं। वर्तमान में स्वास्थ्य महानिदेशालय ने आंतरिक जांच शुरू की है, जिसमें डायरेक्टर पैरामेडिकल की अगुवाई में समिति गठित की गई।

फर्रुखाबाद, बांदा, हाथरस, बलरामपुर, बदायूं और रामपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) अपनी रिपोर्ट्स लेकर महानिदेशालय पहुंचे। तत्कालीन महानिदेशक, निदेशक और अनुभाग अधिकारी ‘जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं’ को पूछताछ के लिए तलब किया गया है। सूत्रों के अनुसार, इन अधिकारियों की मिलीभगत से ही इतना बड़ा फर्जीवाड़ा संभव हुआ, लेकिन जांच में सबसे बड़ी बाधा स्वास्थ्य महानिदेशालय खुद बन गया है।

सीएम योगी की फटकार के बावजूद विभाग पुलिस और CBI की गहन जांच में सहयोग नहीं कर रहा। फर्जी दस्तावेजों और पुरानी फाइलों को छिपाने के प्रयासों की शिकायतें हैं। विभागीय अधिकारी जांच समिति को पूर्ण जानकारी देने में टालमटोल कर रहे हैं, जिससे CBI को अतिरिक्त सबूत जुटाने में कठिनाई हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नौकरशाही का बचाव है, जो भ्रष्टाचार की जड़ों को काटने की कोशिशों को कमजोर कर रहा है।

इस घोटाले ने न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सरकारी भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी। योगी सरकार ने डिजिटल वेरिफिकेशन को मजबूत करने का दावा किया है, लेकिन ऐसे मामलों से जनता का भरोसा डगमगा रहा है।

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