नई दिल्ली, 21 सितंबर 2025। Delhi-NCR Pollution: दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में सर्दियों का मौसम आते ही प्रदूषण का भयंकर संकट फिर से पैदा हो गया है। वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) लगातार ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंच रहा है, जिससे स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित हैं। हाल ही में केंद्रीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) ने एक चौंकाने वाले खुलासे में बताया है कि पंजाब और हरियाणा में धान के पराली जलाने की घटनाओं में पिछले आठ वर्षों (2015-2023) में 50% से अधिक की कमी आई है, लेकिन दिल्ली-एनसीआर में पीएम2.5 के स्तर में कोई उल्लेखनीय गिरावट नहीं हुई।
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यह खुलासा npj Climate and Atmospheric Science जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन पर आधारित है, जो कृषि अवशेष जलाने (CRB) और स्थानीय वायु प्रदूषण के बीच कमजोर संबंध को उजागर करता है।यह अध्ययन बताता है कि पहले जहां पराली जलाना दिल्ली की सर्दी में धुंध के मुख्य कारण के रूप में जिम्मेदार ठहराया जाता था, वहीं अब वास्तविकता कुछ और है। सैटेलाइट डेटा से पता चलता है कि पंजाब-हरियाणा में आग की घटनाओं की संख्या आधी से ज्यादा कम हो गई, लेकिन दिल्ली का AQI अभी भी 300-400 के बीच घूम रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रमुख कारण स्थानीय स्रोत हैं, जैसे वाहनों से निकलने वाले धुएं (51.5% योगदान), निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल (17%), औद्योगिक उत्सर्जन (30%) और घरेलू बायोमास जलाना (14-23%)। सर्दियों में ठंडी हवाओं और स्थिर वायुमंडल के कारण ये प्रदूषक आसानी से जमा हो जाते हैं, जिससे ‘स्मॉग’ की परत मोटी हो जाती है।कृषि विज्ञान केंद्र के अनुसार, 2009 की ग्राउंडवाटर संरक्षण नीति (GWCP) ने अप्रत्यक्ष रूप से समस्या बढ़ाई है। इस नीति ने धान की फसल की अवधि कम कर दी, जिससे कटाई और बुआई के बीच का अंतराल घट गया।
नतीजा? किसान अब पराली जलाने को मजबूर हैं, क्योंकि नई फसल बोने का समय कम हो गया। हालांकि पराली जलाने की घटनाएं घटीं, लेकिन वायुमंडलीय स्थितियां (जैसे धीमी हवाएं और ठंड) धुएं को दिल्ली तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध हुईं। अध्ययन में कहा गया कि सिंचाई वाले कृषि क्षेत्र में 10% वृद्धि हुई, लेकिन भूजल स्तर -3.35 सेमी/वर्ष की दर से गिर रहा है, जो पराली जलाने को प्रोत्साहित कर रहा है।इस खुलासे से सरकारें हिल गई हैं। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने हाल ही में दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण नियंत्रण उपायों की समीक्षा की और पराली जलाने पर केंद्रित साझा कार्रवाई की अपील की।
दिल्ली सरकार ने 15 वर्ष से पुराने वाहनों को ईंधन देने पर रोक लगाने का फैसला किया है, जबकि CAQM ने स्कूल-कॉलेज बंद करने के आदेश दिए। हरियाणा में ‘हैपी सीडर’ जैसी मशीनों का प्रयोग बढ़ रहा है, जो पराली को खाद में बदल देती है। फिर भी, विशेषज्ञ चेताते हैं कि बिना बहु-आयामी दृष्टिकोण के समस्या हल नहीं होगी। वाहन उत्सर्जन कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण और कोयला आधारित प्लांटों में बायोमास को-फायरिंग जैसे उपाय जरूरी हैं।
यह खुलासा एक सबक है कि प्रदूषण सिर्फ एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सहयोग की मांग करता है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो स्वास्थ्य संकट और गहरा सकता है। सांस की बीमारियां, हृदय रोग और कैंसर के मामले बढ़ेंगे, खासकर बच्चों और बुजुर्गों में। आइए, हम सब मिलकर ‘बीट एयर पॉल्यूशन’ अभियान में योगदान दें। स्वच्छ हवा का अधिकार हर नागरिक का है।
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