लखनऊ, 22 सितंबर 2025। Caste Free UP: उत्तर प्रदेश में लंबे समय से चली आ रही जातिगत विभाजन की प्रथा को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, योगी आदित्यनाथ सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में एक व्यापक आदेश जारी किया है। इस आदेश के तहत, राज्य के सभी सरकारी और सार्वजनिक दस्तावेजों, पुलिस रिकॉर्ड, एफआईआर, मोटर वाहन पंजीकरण, साइनबोर्ड तथा अन्य अभिलेखों से व्यक्तियों के नाम के साथ जाति या उपनाम का उल्लेख पूरी तरह हटाने का निर्देश दिया गया है।
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यह बदलाव न केवल सामाजिक समानता को बढ़ावा देगा, बल्कि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को मजबूत करेगा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 19 सितंबर 2025 को इस मामले में सुनवाई करते हुए यूपी सरकार को सख्त हिदायतें जारी कीं। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि संविधान के प्रति श्रद्धा और देशभक्ति को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए, न कि जातिगत पहचान को। न्यायमूर्ति ने फैसले में उल्लेख किया कि जातिवाद समाज के लिए एक अभिशाप है, जो राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है।
इस संदर्भ में, कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को भेजी जाए, जो इसे मुख्यमंत्री कार्यालय, केंद्रीय गृह मंत्रालय, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय तथा भारतीय प्रेस परिषद के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। योगी सरकार ने इस आदेश को तत्काल प्रभावी बनाने के लिए सभी जिला मजिस्ट्रेटों और पुलिस अधिकारियों को पत्र जारी किया है। इसके अनुसार, एफआईआर दर्ज करते समय आरोपी या शिकायतकर्ता की जाति का कोई जिक्र नहीं होगा।
इसी प्रकार, पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट, शिकायत पुस्तिकाओं और अदालती दस्तावेजों से भी जातिगत संदर्भ मिटा दिए जाएंगे। मोटर वाहन विभाग में ड्राइविंग लाइसेंस और वाहन पंजीकरण फॉर्मों में भी नाम के साथ जाति का कॉलम समाप्त कर दिया गया है। सार्वजनिक स्थानों पर लगे साइनबोर्ड, जैसे दुकानों, होटलों और प्रतिष्ठानों के नामपट्टों से भी जाति-आधारित उपनाम हटाने का अभियान चलाया जाएगा। उल्लंघन करने वालों पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है, जिसमें जुर्माना और कानूनी कार्यवाही शामिल है।
यह नियम परिवर्तन उत्तर प्रदेश के सामाजिक परिदृश्य को बदलने वाला साबित होगा। राज्य में जाति-आधारित आरक्षण और कल्याण योजनाओं के अलावा, दैनिक जीवन में जातिगत भेदभाव की जड़ें गहरी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम न केवल सामाजिक न्याय को मजबूत करेगा, बल्कि युवाओं में समावेशी सोच विकसित करेगा। विपक्षी दलों ने इसे स्वागतयोग्य बताया है, हालांकि कुछ ने इसे चुनावी स्टंट करार दिया। फिर भी, योगी सरकार का दावा है कि यह संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है।इस आदेश से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के दस्तावेज भी शामिल हैं।
उदाहरणस्वरूप, स्कूल एडमिशन फॉर्मों और सरकारी नौकरियों के आवेदनों में जाति कॉलम केवल आरक्षण उद्देश्य के लिए सीमित रहेगा, न कि पहचान के रूप में। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि 2047 तक विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब जातिवाद का अंत हो। योगी सरकार ने इसे अमल में लाने के लिए एक टास्क फोर्स गठित की है, जो तीन माह में प्रगति रिपोर्ट सौंपेगी।यह बदलाव निश्चित रूप से उत्तर प्रदेश को एक नई दिशा देगा, जहां व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से होगी, न कि जन्म से। समाज के हर वर्ग को इसकी सराहना करनी चाहिए।
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