नई दिल्ली, 23 दिसंबर 2025। BJP vs Congress: बर्लिन की अपनी हालिया यात्रा के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हर्टी स्कूल में एक व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने भारत की चुनावी व्यवस्था और लोकतंत्र पर गंभीर सवाल उठाए। राहुल ने आरोप लगाया कि देश की चुनावी मशीनरी में बुनियादी समस्याएं हैं।
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उन्होंने हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 का उदाहरण देते हुए कहा कि कांग्रेस ने वहां जीत हासिल की थी, लेकिन “वोट चोरी” के जरिए जनादेश बदल दिया गया। इसी तरह महाराष्ट्र चुनावों को भी निष्पक्ष नहीं बताया। राहुल ने बीजेपी पर संस्थागत ढांचे पर पूर्ण कब्जा करने का आरोप लगाया, जिसमें चुनाव आयोग, सीबीआई, ईडी और खुफिया एजेंसियों को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि बीजेपी संविधान की मूल भावना को खत्म करने का प्रस्ताव रख रही है, जो सभी को समान अधिकार देता है। राहुल के अनुसार, संस्थाओं का हथियारीकरण हो रहा है – बड़े उद्योगपति अगर विपक्ष का समर्थन करें, तो उन पर छापे पड़ते हैं, जबकि बीजेपी समर्थकों को संरक्षण मिलता है। उन्होंने विपक्ष की एकजुटता पर जोर देते हुए कहा कि अब लड़ाई सिर्फ चुनावों की नहीं, बल्कि वैकल्पिक भारत की दृष्टि की है।
विपक्ष एक “प्रतिरोध प्रणाली” बनाएगा जो सफल होगी। राहुल ने उत्पादन और लोकतंत्र के संबंध पर भी बात की, कहा कि चीन को उत्पादन सौंपने से नौकरियां कम हुईं और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी। इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने तीव्र प्रतिक्रिया दी। पार्टी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने राहुल पर हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस भारतीय लोकतंत्र और देश की प्रगति से नफरत करती है।
उन्होंने राहुल को जॉर्ज सोरोस जैसे “भारत-विरोधी ताकतों” से जुड़ा बताया और आरोप लगाया कि कांग्रेस अराजकता और अशांति चाहती है। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल पर विदेशी धरती से भारत को बदनाम करने का आरोप लगाया, जबकि संसद सत्र चल रहा था। अन्य नेताओं ने राहुल को “अपरिपक्व” और “प्रोपगैंडा का नेता” कहा। केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे ने उन्हें “एंटी-इंडिया लीडर” करार दिया।
यह विवाद राहुल की पांच दिवसीय जर्मनी यात्रा का हिस्सा है, जहां उन्होंने भारतीय प्रवासी समुदाय से भी मुलाकात की। दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप से राजनीतिक माहौल और गरमा गया है। एक तरफ विपक्ष लोकतंत्र की रक्षा की बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ सत्ताधारी दल इसे देशद्रोह बता रहा है। यह घटना भारतीय राजनीति में विदेशी धरती से दिए बयानों की पुरानी परंपरा को दोहराती है, जो हमेशा विवादास्पद रही है।
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