पटना, 30 अक्टूबर 2025। Bihar Elections 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में सांस्कृतिक प्रतीकों का बोलबाला है। मिथिलांचल में पाग, पान, माछ और मखाना जैसे तत्व सम्मान के प्रतीक बनकर नेताओं को जनता से जोड़ते हैं, तो भोजपुरिया क्षेत्र में गमछा कंधे पर डालकर अपनापन का एहसास जगाया जाता है। यह चुनावी रणनीति इतनी सधी हुई है कि आचार संहिता का उल्लंघन किए बगैर वोटरों का दायरा बढ़ाया जाता है।
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दल के शीर्ष नेता चादरपोशी या स्थानीय रीति-रिवाजों से संपर्क विस्तार करते हैं, लेकिन भावनात्मक कनेक्शन में थोड़ी सी भूल भारी पड़ सकती है। आइए समझें कैसे…समस्तीपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया दौरे पर मिथिलांचल की संस्कृति ने कमाल दिखाया। उन्हें पाग, मखाने की माला, सूर्य मूर्ति और मिथिला पेंटिंग से सम्मानित किया गया।
भाषण में पीएम ने पाग, मखाना और माछ का जिक्र कर स्थानीयों का दिल जीत लिया। उन्होंने मखाना को जीआई टैग दिलाने की उपलब्धि गिनाई, जो वैश्विक पहचान का प्रतीक है। इससे न सिर्फ मोदी का राजनीतिक कद बढ़ा, बल्कि मिथिलांचल को केंद्र की योजनाओं से जोड़ा गया। ये प्रतीक चुनावी मंचों तक सीमित नहीं; सामान्य आयोजनों में भी इन्हें अपनाया जाता है, जो व्यक्ति-व्यक्ति के बंधन को मजबूत करते हैं। हालांकि, सांस्कृतिक प्रतीकों का बेजा इस्तेमाल कभी-कभी बुमरैंग की तरह लौट आता है।
आपने देखा है कि आपका ये बेटा तो छठी मईया की जय-जयकार दुनिया में कराने में लगा है।
दूसरी तरफ ये कांग्रेस और RJD के लोग छठी मईया का अपमान कर रहे हैं।
क्या कोई कभी चुनाव में वोट पाने के लिए छठी मईया का अपमान कर सकता है?
क्या ऐसा अपमान, बिहार, हिंदुस्तान और मेरी माताएं जो निर्जला… pic.twitter.com/NC8kiIPqyr
— BJP Bihar (@BJP4Bihar) October 30, 2025
अलीनगर विधानसभा में भाजपा उम्मीदवार और लोकगायिका मैथिली ठाकुर के समर्थन कार्यक्रम में यूपी के बलिया से भाजपा विधायक केतकी सिंह ने हंगामा मचा दिया। उन्होंने कहा, “मिथिला की असली पहचान पाग नहीं, मैथिली ठाकुर हैं!” कहते हुए पाग को टेबल पर फेंक दिया। इससे कार्यकर्ताओं और स्थानीयों में आक्रोश फैल गया। बात यहीं थमी नहीं। एक वायरल वीडियो में मैथिली ठाकुर खुद वोटरों से बातचीत के दौरान पाग को कटोरा बनाकर मखाना खाती नजर आईं।
मिथिला प्रेमियों की नाराजगी चरम पर पहुंच गई, जो उनकी छवि को धक्का पहुंचा सकती है। चुनावी भावनात्मक अपील कोई नई चाल नहीं, लेकिन समय के साथ इसमें लोकलुभावन तत्व जुड़ते गए हैं। मिथिलांचल में प्रतीक अपनाना वोट जोड़ने का सुनहरा जरिया है, जबकि भोजपुरिया इलाके में गमछा पहनाकर या लिट्टी-चोखा खिलाकर सांस्कृतिक समरसता दिखाई जाती है। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मजारों पर चादरपोशी से समुदाय को अपने पाले में लाया जाता है। ये तरीके मतदाताओं की भावनाओं को छूते हैं, उम्मीदवार की व्यक्तिगत कहानी साझा कर विश्वास जगाते हैं, लेकिन गलत कदम से उल्टा नुकसान होता है जैसे मैथिली ठाकुर केस में हुआ। वि
शेषज्ञों का मानना है कि सच्चा कनेक्शन प्रामाणिकता पर टिका होता है, न कि सतही दिखावे पर। बिहार चुनाव में ये प्रतीक वोट की कुंजी साबित होंगे, बशर्ते सम्मान सच्चा हो। आने वाले महीनों में ये रणनीतियां और तीखी होंगी, जो न सिर्फ सीटें जीतेंगी बल्कि सांस्कृतिक धरोहर को भी मजबूत करेंगी।
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