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बिहार विधानसभा चुनाव: नौकरी और रोजगार के वादों में उलझी सियासत

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सरगर्मी तेज हो चुकी है, और इस बार रोजगार और नौकरी का मुद्दा मतदाताओं, खासकर युवाओं, के बीच सबसे ज्यादा चर्चा में है। सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश कुमार और विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के तेजस्वी यादव दोनों ही युवाओं को लुभाने के लिए रोजगार के बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं। बिहार की सियासत में इस बार युवा वोटरों का रुझान तय करेगा कि सत्ता की चाबी किसके हाथ में होगी।रोजगार का मुद्दा क्यों बना केंद्र बिंदु?बिहार में बेरोजगारी लंबे समय से एक ज्वलंत समस्या रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, खासकर युवाओं में।

शिक्षित युवाओं की बढ़ती संख्या और सीमित नौकरी के अवसरों ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। बिहार के युवा अब केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं रहना चाहते; वे निजी क्षेत्र में अवसर, स्टार्टअप्स के लिए सहायता, और कौशल विकास की मांग कर रहे हैं।नीतीश कुमार का दांव: विकास और नौकरी के वादेमुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी सरकार की उपलब्धियों पर जोर देते हुए कहा कि उनकी सरकार ने पिछले कार्यकाल में लाखों सरकारी नौकरियां दीं और बिहार में औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया। उन्होंने हाल ही में एक रैली में दावा किया कि उनकी सरकार अगले पांच वर्षों में 10 लाख नौकरियां सृजित करेगी, जिसमें शिक्षक, पुलिस, और अन्य सरकारी विभागों में भर्तियां शामिल हैं। नीतीश ने बिहार में निवेश आकर्षित करने के लिए “बिहार बिजनेस समिट” जैसे आयोजनों का भी हवाला दिया, जिसके जरिए निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाने का दावा किया जा रहा है।हालांकि, विपक्ष नीतीश के इन वादों को “जुमला” करार दे रहा है। तेजस्वी यादव ने नीतीश सरकार पर बेरोजगारी के मुद्दे पर विफलता का आरोप लगाया और कहा कि बिहार के युवा “खोखले वादों” से तंग आ चुके हैं।तेजस्वी यादव की रणनीति: युवा-केंद्रित एजेंडाआरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इस बार अपनी पूरी रणनीति युवाओं पर केंद्रित कर दी है। उन्होंने अपने पिछले “10 लाख नौकरियों” के वादे को और मजबूती से दोहराया है।

तेजस्वी का कहना है कि अगर उनकी सरकार सत्ता में आती है, तो वे न केवल सरकारी नौकरियां देंगे, बल्कि बिहार में आईटी हब, स्टार्टअप इकोसिस्टम, और कौशल विकास केंद्र स्थापित करेंगे। उन्होंने नीतीश सरकार पर बिहार से पलायन रोकने में विफलता का आरोप लगाते हुए कहा, “बिहार के युवा दिल्ली, मुंबई और सूरत में मजदूरी करने को मजबूर हैं, क्योंकि नीतीश सरकार ने कोई ठोस नीति नहीं बनाई।”युवा वोटरों का मूडबिहार की कुल आबादी में 50% से अधिक युवा हैं, जो 35 वर्ष से कम उम्र के हैं। ये युवा न केवल रोजगार, बल्कि बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, और बुनियादी ढांचे की मांग कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर #BiharWantsJobs और #YuvaHallaBol जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जो युवाओं की नाराजगी और उनकी मांगों को दर्शाते हैं।

पटना के एक कॉलेज छात्र अमन कुमार ने कहा, “हमें नौकरी चाहिए, चाहे वह सरकारी हो या निजी। नेताओं के वादों से अब भरोसा उठ चुका है। जो पार्टी ठोस योजना लाएगी, हम उसी को वोट देंगे।”विशेषज्ञों की रायराजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार बिहार का चुनाव रोजगार और आर्थिक विकास के इर्द-गिर्द लड़ा जाएगा। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आनंद कुमार कहते हैं, “बिहार के युवा अब जागरूक हैं। वे नेताओं के खोखले वादों को परखना जानते हैं। जो पार्टी रोजगार और विकास के लिए ठोस रोडमैप देगी, वही सत्ता में आएगी।”क्या होगा भविष्य?जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, नीतीश और तेजस्वी दोनों ही युवाओं को लुभाने के लिए अपनी रणनीतियों को और तेज कर रहे हैं।

नीतीश जहां अपनी सरकार के अनुभव और विकास कार्यों पर भरोसा कर रहे हैं, वहीं तेजस्वी बदलाव और नई सोच का दावा कर रहे हैं। अब यह देखना बाकी है कि बिहार का युवा किसके वादों पर भरोसा करता है और सत्ता की चाबी किसके हाथ में सौंपता है।

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