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Acid Attack Case: 16 साल की लड़ाई का दर्दनाक अंत, 2009 एसिड अटैक केस में सभी आरोपी बरी

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नई दिल्ली, 25 दिसंबर 2025। Acid Attack Case: दिल्ली की रोहिणी कोर्ट ने 2009 के चर्चित एसिड अटैक मामले में बड़ा और चौंकाने वाला फैसला सुनाया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जगमोहन सिंह ने तीन मुख्य आरोपियों- यशविंदर मलिक, उनकी पत्नी बाला और मंदीप मान को सबूतों के अभाव और जांच में गंभीर खामियों का हवाला देकर बरी कर दिया।

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यह फैसला महज कुछ हफ्ते बाद आया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले की 16 साल की देरी पर गहरी नाराजगी जताते हुए इसे ‘सिस्टम का मजाक’ और ‘राष्ट्रीय शर्म’ करार दिया था। पीड़िता शाहीन मलिक के लिए यह 16 साल की कानूनी जंग का बेहद दर्दनाक अंत है, जिन्होंने हमले के बाद 25 से अधिक सर्जरी झेलीं और एक आंख की रोशनी खो दी। मामला हरियाणा के पानीपत का है, जहां 2009 में 23 साल की शाहीन मलिक पर एसिड अटैक हुआ था।

शाहीन पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से एमबीए कर रही थीं और यशविंदर मलिक के कॉलेज में स्टूडेंट काउंसलर की नौकरी जॉइन की थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, यशविंदर से यौन उत्पीड़न और धमकियां मिलने के बाद शाहीन ने नौकरी छोड़ने का फैसला किया। आरोप था कि नौकरी छोड़ने के 11 दिन पहले यशविंदर ने अपनी पत्नी बाला के साथ मिलकर यूनिवर्सिटी के दो छात्रों- मंदीप मान और एक नाबालिग के साथ साजिश रची।

नाबालिग ने मुंह ढककर शाहीन पर एसिड फेंका, जिससे उनका चेहरा और शरीर बुरी तरह झुलस गया। शाहीन ने 20 नवंबर 2009 को FIR दर्ज कराई, लेकिन पुलिस ने मार्च 2010 में केस को ‘अनट्रेस्ड’ घोषित कर दिया। 2013 में शाहीन ने हरियाणा सरकार से संपर्क किया, तब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट परमिंदर कौर ने केस दोबारा खोला। 2014 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मुकदमा दिल्ली ट्रांसफर हुआ। 2015 में वयस्क आरोपियों पर गंभीर यौन उत्पीड़न, आपराधिक धमकी, हत्या के प्रयास और साजिश के आरोप तय हुए।

नाबालिग को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने दोषी ठहराया, लेकिन साजिश के आरोप में उसे क्लीन चिट मिली। 2016 में ट्रायल कोर्ट ने वयस्कों को बरी किया, लेकिन 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल दोबारा शुरू करने का आदेश दिया। अब कोर्ट ने कहा कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। जांच में खामियां थीं, जरूरी सबूत रिकॉर्ड पर नहीं लाए गए।

जुवेनाइल के साजिश में दोषी न ठहराए जाने को भी आधार बनाया गया। फैसला सुनते समय शाहीन कोर्ट में मौजूद थीं। बाहर आकर वे भावुक हो गईं और बोलीं, “मैं एसिड अटैक से नहीं टूटी, लेकिन न्याय व्यवस्था ने मुझे तोड़ दिया। जज ने कहा कि जांच दोबारा हो, लेकिन 16 साल बाद क्या जांच? इससे अच्छा तो केस लड़ती ही नहीं।”

उन्होंने कहा कि उनके चेहरे के निशान और मेडिकल दस्तावेज झूठ नहीं बोल सकते। शाहीन ने 2013 से एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए काम शुरू किया और 2021 में ब्रेव सोल्स फाउंडेशन बनाया, जहां अपना घर शेल्टर होम चलाती हैं। उनके वकील ने कहा कि फैसले को हाई कोर्ट और जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी।

दिसंबर 2025 में ही सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन की PIL पर देरी को ‘राष्ट्रीय शर्म’ कहा था और सभी हाई कोर्ट से एसिड अटैक केस की पेंडेंसी का ब्योरा मांगा था।यह फैसला एसिड अटैक जैसे जघन्य अपराधों में जांच और सबूतों की कमजोरी को उजागर करता है। पीड़ितों के लिए न्याय की राह कितनी कठिन है, यह शाहीन की कहानी से साफ झलकता है।

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