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RTI से बड़ा खुलासा, दिल्ली के सभी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पैरामीटर्स में फेल, वेस्ट वॉटर संकट की शुरुआत

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नई दिल्ली

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नई दिल्ली, 31 अक्टूबर 2025। नई दिल्ली में जल संकट के बीच एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। दिल्ली जल बोर्ड रोजाना लगभग 990 मिलियन गैलन प्रति दिन (एमजीडी) पानी की आपूर्ति करता है, लेकिन इसका करीब 80 प्रतिशत घरों से वेस्ट वॉटर के रूप में निकलता है। यानी प्रतिदिन करीब 792 एमजीडी गंदा पानी उत्पन्न होता है। इसकी सफाई के लिए दिल्ली में 37 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) स्थापित हैं, जो महरौली, मोलड़बंद, नजफगढ़, नरेला, निलोठी, न्यू ओखला, पप्पनकलां, रिठाला, रोहिणी, सोनिया विहार, वसंत कुंज और यमुना विहार जैसे क्षेत्रों में फैले हुए हैं। हालांकि, इन प्लांट्स की प्रभावशीलता पर सवाल उठे हैं।

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गुड़गांव निवासी विश्वास द्विवेदी ने जून 2025 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) में आरटीआई दाखिल की, जिसके जवाब में 24 अक्टूबर को जारी रिपोर्ट ने सबको हैरान कर दिया। रिपोर्ट में पाया गया कि कोई भी एसटीपी सभी सात निर्धारित पैरामीटर्स पर खरा नहीं उतर रहा।

 ट्रीटमेंट प्रक्रिया की कमियां

द्विवेदी की आरटीआई के तहत सीपीसीबी ने सभी एसटीपी से ट्रीटेड वेस्ट वॉटर के सैंपल एकत्र किए और उनकी जांच की। रिपोर्ट से स्पष्ट है कि ट्रीटमेंट प्रक्रिया अपेक्षाकृत अपर्याप्त है। दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारियों के अनुसार, वेस्ट वॉटर को सुरक्षित बनाने के लिए सात मुख्य पैरामीटर्स पीएच (6.5-9), कुल सस्पेंडेड सॉलिड्स (टीएसएस, 10 एमजी/लीटर या कम), बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी, 10 एमजी/लीटर या कम), केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी, 50 एमजी/लीटर या कम), अमोनिकल नाइट्रोजन (5 एमजी/लीटर तक), कुल नाइट्रोजन (टीएन) और फॉस्फेट लेवल—का अनुपालन अनिवार्य है, लेकिन सभी प्लांट्स में ये स्तर निर्धारित सीमाओं से कहीं अधिक पाए गए।

उदाहरण के लिए, ज्यादातर सैंपलों में बीओडी और सीओडी के स्तर 20-30 एमजी/लीटर से ऊपर थे, जबकि फॉस्फेट और नाइट्रोजन की मात्रा भी खतरनाक रूप से अधिक थी। यह कमी न केवल तकनीकी खराबी दर्शाती है, बल्कि रखरखाव और निगरानी की लापरवाही को भी उजागर करती है।

 पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिम

इस खुलासे का सबसे बड़ा असर यमुना नदी की सफाई पर पड़ सकता है। दिल्ली में यमुना की प्रदूषण नियंत्रण योजनाएं मुख्य रूप से इन एसटीपी पर निर्भर हैं। सरकार ने नदी के प्रवाह को बढ़ाने और उसे निर्मल बनाने के लिए 9-10 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की तैयारियां की हैं, लेकिन यदि ट्रीटेड पानी की गुणवत्ता खराब रही, तो पूरा प्लान विफल हो सकता है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि अधिकांश प्लांट्स से निकलने वाले पानी में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा लाखों में है, जो जलजनित रोगों का खतरा बढ़ाता है। यह न केवल मानव स्वास्थ्य के लिए घातक है, बल्कि यमुना के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी नष्ट कर रहा है। मछलियों और अन्य जीवों की मृत्यु दर बढ़ रही है, जिससे जैव विविधता पर संकट मंडरा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना तत्काल सुधार के, दिल्ली का जल प्रदूषण और गहरा सकता है।

 सुधार की आवश्यकता  

यह RTI खुलासा दिल्ली सरकार और जल बोर्ड के लिए चेतावनी का संकेत है। तत्काल कदम उठाने की जरूरत है, जैसे प्लांट्स का आधुनिकीकरण, सख्त मॉनिटरिंग और जन जागरूकता। यदि सुधार नहीं हुए, तो न केवल यमुना काली बनी रहेगी, बल्कि भूजल प्रदूषण भी बढ़ेगा। नागरिकों को भी वेस्ट वॉटर प्रबंधन में योगदान देना होगा। कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो नीतिगत बदलाव की मांग करता है।

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